यहाँ “दिल की बीमारी” से मुराद है:
शक
निफ़ाक़
हसद
तकब्बुर
दुनियापरस्ती
जब इंसान अपनी रूहानी बीमारी का इलाज नहीं करता, बल्कि उसी में जीता रहता है, तो वह और गहरी होती जाती है।
अल्लाह ज़ुल्म नहीं करते — इंसान खुद रास्ता चुनता है, फिर उसी पर आगे बढ़ता चला जाता है।